अगर अंतिम संस्कार के वक्त मृतक के सिर पर डंड़ा ना मारा जाये, तो बनता है लोगों के लिए खतरा

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ये तो सब जानते हैं कि जो व्यक्ति इस दुनिया में आया है वो उसे एक ना एक दिन दुनिया को अलविदा कहना ही है और ये भी जानते हैं कि दुनिया में आने और दुनिया से जाने के लिए व्यक्ति को भारी किमत चुकानी पड़ती है, जो ईश्वर द्वारा बनाये गये नियम है. देखा जाये तो जब बच्चा पैदा होता है तो उसकी पीट पर मारा जाता है ताकि उसके रोने से पता चले कि वो स्वस्थ्य है. वहीं जब व्यक्ति मरता है तब भी उसे डंडे से मारा जाता है, जी हां…कभी आपने सोचा है कि मरते हुए व्यक्ति को डंडे से क्यों मारा जाता है.

कुछ लोग अपनी जिदंगी से परेशान होकर ये सोचकर आत्महत्या कर लेते हैं कि उन्हें सूकून और शांति मिलेगी लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है जब व्यक्ति मरता है तब उसे पीटकर अंतिम संस्कार किया जाता है. हिंदू धर्म में जिस तरह से हर काम को करने के लिए शुभ मुहूर्त देखा जाता है ठीक ऐसे ही अंतिम संस्कार के वक्त शव के शरीर पर डंडा मारने की एक परंपरा है और ये परंपरा के बिना अंतिम संस्कार पूरा नहीं माना जाता है.

गरुड़ पुराण की माने तो मृत व्यक्ति को मुखाग्नि देने के बाद उसके बाकी शरीर की अपेक्षा उसके सर पर ज्यादा घी डाला जाता है. वो इसलिए ताकि उसका सर अच्छी तरह से जल जाए. ऐसे में जब सर जल जाता है, तो उस पर डंडा मार कर यानि कि सर पर डंडे से वार करके उसे तोड़ दिया जाता है. बता दे कि श्मशान में होने वाली इस क्रिया को ही कपाल क्रिया कहते है. अब आप सोच रहे होंगे कि मरने के बाद आखिर व्यक्ति का सर क्यों तोडा जाता है, तो इसके पीछे भी एक वजह है.

इसका पहला कारण तो ये है कि अगर सर पर वार करके उसे न तोडा जाए, तो कई बार सर अधजला भी रह जाता है. यानि वो पूरी तरह नहीं जलता, कभी-कभी सिर के अंदर गैस भर जाती है और वो उछले ना इसलिए शव पर डंडा मारकर तोड़ दिया जाता है. अब जाहिर सी बात है कि जब तक मृत व्यक्ति का सर पूरी तरह से नहीं जलेगा, तब तक उसका अंतिम संस्कार भी संपन्न नहीं माना जाता. इसके इलावा धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका दूसरा कारण इंसान को सांसारिक बंधनो से मुक्त करना होता है. जी हां कपाल क्रिया के बाद ही एक मृत व्यक्ति को सांसारिक बंधनो से छुटकारा मिलता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.

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