कांवड़ यात्रा के दौरान व्यक्ति को ये 4 काम भूलकर भी नहीं करना चाहिए, भोलेनाथ हो जाते हैं नाराज

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गली और सड़को पर कांवड़ यात्रियों द्वारा भोलेनाथ के जयकारों से भी सावन की शुरुआत होती है. सोमवार से सड़कों पर कांवड़ यात्रियों की गूंज सुनाई देने वाली है और उससे पहले तैयारियां भी जोरों-शोरों से चलने लगी हैं. कंधे पर गंगाजल लेकर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों पर चढ़ाने की परंपरा को कांवड़ यात्रा कहते हैं. फूल-माला, घंटी और घुंघरु से सजे दोनों तरफ डंडो पर गंगाजल को टांगा जाता है. धूप-दीप की खुशबू, मुख में ‘बोल बम’ के नारे के साथ कांवड़िए मीलो दूर तक पैदल चलते चले जाते हैं. जानते हैं ये परंपरा क्यों की जाती है.

ऐसा कहा जाता है कि सबसे पहले रावण ने कांवड़िया निकाली थी, वहीं बताया ये भी जाता है कि भगवान राम ने भी भगवान शिव को कांवड़ चढ़ाई थी. आनंद रामायण मे .. इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान राम ने कांवड़िया बनाकर सुल्तानगंज से जल लिया और देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया था. जिसके बाद से लोग इस पंरपरा को करने लगे. भक्त मनोवांछित फल पाने के लिए कांवड़ यात्रा को धूमधाम से निकालते हैं.

कई तरह की होती है कांवड़

1. सामान्य कांवड़: जिसमें कांवड़िए स्टैंड पर कांवड़ रखकर आराम से जाते हैं
2. डाक कांवड़: इसमें शिव के जलाभिषेक तक लगातार चलते रहना होता है.
3. खड़ी कांवड़: कुछ भक्तों के साथ सहयोगी भी चलते हैं, जब वे आराम करते हैं दूसरे कांवड़ को चलने के अंदाज में हिलाते-डुलाते रहते हैं.
4. दांडी कांवड़: ये भक्त नदी तट से शिवधाम तक की यात्रा दंड देते हुए पूरी करते हैं। इसमें एक महीने तक का वक्त लग जाता है.
बताया जाता है कि कांवड़ यात्रा के वक्त व्यक्ति को चमड़े की कोई भी चीज अपने पास नहीं रखनी चाहिए, बिना नहाए कांवड़ को हाथ भी नहीं लगाना चाहिए, किसी पेड़ के नीछे कांवड़ नहीं रखनी चाहिए, चारपाई का इस्तेमाल भी नहीं करना चाहिए, सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात कांवड़ को अपने सिर पर ऊपर से लेकर जाना भी वर्जित माना जाता है. कांवड़ ले जाते वक्त व्यक्ति को मांस, मदिरा या फिर तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए.

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