31वें बाण में जैसे ही रावण का विशाल धड़ धरती पर गिरा वैसे की रावण ने लक्ष्मण को दिये थे ये 3 सीख, जो आज भी हैं सत्य

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असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है दशहरा…पूरा देश इस महापर्व को बड़े ही धूमधाम से मनाता है. हर शहर के कई इलाकों में जगह-जगह पर मेले लगाए गये हैं, जिसमे रावण के पुतले बनाये गये हैं. मेले में आयोजित की गई रामलीला के माध्यम से भगवान श्री राम जी की वीर गाथा दिखाई जाती है, उन्होंने कैसे आज के दिन इतने बुद्धिमान रावण का वध किया था. वैसे तो पूरा देश इस दिन लंकापति के रावण के वध होने पर इस त्यौहार को बड़े ही धूमधाम से मनाता है, वहीं किसान आज के दिन नई फसलों के घर आने की खुशी में मनाते हैं. आज के दिन कई लोग अपने औजारों और हथियारों की पूजा करते हैं. यहां तक कई शहरों में तो रावण का वध नहीं बल्कि पूजा की जाती है.

ऐसा कहा जाता है कि रावण सबसे ज्यादा बुद्धिमान था, शायद इसलिए लोग रावण दहन से पहले रावण के पांव छूते हैं और उनसे ज्ञान की प्रार्थना मांगते हैं. यहां तक कि लक्ष्मण ने भी रावण के वध के वक्त उनके पैरों की तरफ बैठकर उनसे ज्ञान सीखा था. राम जी ने 31 बाणों में रावण का सिर धड़ से अलग कर धरती पर गिराया था. 30 बाणों से उसके 10 सिर और 20 हाथ धड़ से अलग हो गए. जैसे ही रावण का विशाल धड़ पृथ्वी पर गिरा तो पृथ्वी हिलने लगी थी. उसके बाद 31 वां और आखिरी बाण जैसे ही रावण की नाभि पर लगा वैसे ही रावण ने मरते वक्त राम जी के आगे हाथ जोड़कर आखिरी सांस ली.

रावण ने मरते वक्त राम जी के हाथ जोड़कर कहा था कि मेरी मौत तुम्हारे हाथ ही होनी थी प्रभु, जिसके बाद राम जी ने भाई लक्ष्मण से ज्ञानी रावण से पांव की तरफ बैठकर ज्ञान लेने को कहा था और मरते वक्त रावण ने लक्ष्मण को 3 सीख दिये थे.

रावण ने मरते वक्त लक्षमण से कहा था.अच्छे कार्य में कभी विलंब नहीं करना चाहिए. अशुभ कार्य को मोह वश करना ही पड़े तो उसे जितना हो सके उतना टालने का प्रयास करना चाहिए.

रावण ने लक्ष्मण से कहा था कि मुझे ब्रह्मा जी से वर मिला था की वानर और मानव के अलावा कोई मुझे मार नहीं सकता, लेकिन मैं फिर किसी मानव को मानव नहीं समझता था. उन्हें हमेशा तुच्छ समझता रहा. रावण ने कहा कि मुझे मेरे अहंकार ने मुझे नष्ट कर दिया, इसलिए कभी किसी चीज का अंहकार नहीं करना चाहिए.
तीसरी और अंतिम बात रावण नें यह कही कि, अपने जीवन के गूढ रहस्य स्वजन को भी नहीं बताने चाहिए. चूंकि रिश्ते और नाते बदलते रहते हैं. जैसे की विभीषण जब लंका में था तब मेरा शुभेच्छु था, पर श्री राम की शरण में आने के बाद मेरे विनाश का माध्यम बना.

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