अगर उत्तराखंड सरकार इस तकनीक की मांग कर लें तो उत्तराखंड भूस्खलन से बच सकता है

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उत्तराखंड में कई ऐसे इलाके हैं जो भूस्खलन की मार झेल रहे हैं, ऐसे में आईआईटी रुड़की ने एक ऐसी तकनीक लाने का विचार किया है जिसका इस्तेमाल इटली में किया जा रहा है, जिसकी सहायता से हमे फोन पर भूस्खलन होने की खबर प्राप्त हो सकती है. इस वैज्ञानिक तकनीक से हमे पहाड़ों के खिसकने की पहले से ही खबर मिल जायेगी. जहां आईआईटी रुड़की ये विचार सोच ही रहा है, वहीं इटली में ये तकनीक प्रयोग में ली जाने लगी है, पिछले एक साल से इटली में इस तकनीक पर काम किये जाने लगा है.

बहुत जल्द आईआईटी रुड़की के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिक डॉ. जयंत कुमार घोष जियो स्पेशियल टेक्नोलॉजी को विकसित करने में जुटे हैं. जयंत कुमार इससे पहले हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन पर अर्ली वार्निंग कम्यूनिकेशन सिस्टम विकसित कर चुके हैं, जो नासा के टीआरएमएम (ट्रॉपिकल रेनफॉल मेजरिंग मिशन) सेटेलाइट से  बारिश के डाटा और अन्य जानकारी एसएमएस के बताता है.

2010 में आईआईटी और इटली की पॉलीटेक्निको डी टोरीनो यूनिवर्सिटी बीच शोध समझौते के तहत इस जियो वार्न तकनीक के तहत प्रोफेसर पियरो बोकॉर्डो ने काम शुरु किया था जो इटली में आज ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है लेकिन अभी आईआईटी रुड़की में इस पर शुरुआत नहीं हो पाई है, अगर उत्तराखंड सरकार इस तकनीक को अपनाने की मांग करें तो उत्तराखंड को भूस्खलन से बचा जा सकता है.

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