उत्तराखंड में इस अनोखे रिवाज से भी मनाई जाती है संक्रांत, जिसमें 7 मौतें माफ कर दी जाती हैं

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हिंदू समाज में एक ना एक त्यौहारों का सिलसिला चलता ही रहता है. नये साल की शुरुआत में संक्रांत से त्यौहारों की शुरूआत हो जाती है. इस त्यौहार पर कहीं-कहीं खिचड़ी, रुड़ी, मुंगफली और पैसों का दान-पुण्य किया जाता है. 14-15 जनवरी को पूरे देश में संक्रांत बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है. जगह-जगह भंडारे होते हैं तो कई लोग ब्राह्माणों को भी भोजन करवाते हैं. हर राज्य में अपने अलग-अलग रिवाज से संक्रांत का त्यौहार मनाया जाता है, लेकिन उत्तराखंड में सबसे अनोखे रिवाज से संक्रांत मनाया जाता है. उत्तराखंड के पौड़ी में मकर संक्रांत के शुभ अवसर पर मेला लगता है जिसमें सबसे ज्यादा गेंद मेला प्रसिद्ध माना जाता है. गेंद मेला से ही आप समझ गये होंगे कि जरूर गेंद से इस मेले का ताल्लुक होगा. जी हां…आप सही समझ रहे हैं इस मेले में गेंद से खेला जाता है. इसके अलावा संक्रांत में यहां ऐसे रिवाज होते हैं कि जानकर आप भी हैरान रह जायेंगे.
15 जनवरी यानि कल परंपरा के अनुसार थलनदी और डाडामंडी के गेंद मेला का आयोजन किया जायेगा. गेंद खेलने मेले में दूर-दूर से लोग आते हैं, इस खेल का ना ही कोई नियम है और न ही कोई खिलाड़ियों की संख्या…मेले का मुख्य आकर्षण एक चमड़े की गेंद होती है, जिसके चारों तरफ एक एक कंगन मजबूती से लगे होते हैं। यह खेल खुले खेतों में खेला जाता है. कहा ये भी जाता है कि खेल के दौरान अगर किसी की मौत भी हो जाती है तो माफ होती है. गेंद खेल में सात मौते माफ की जाती हैं.
खेल में गेंद को अपनी सीमा तक लाने में दोनों पक्षों में खूब छीना-झपटी, धक्का-मुक्की और तनातनी भी होती हैं जिसमें किसी की मौत का भी डर रहता हैं, लेकिन अभी तक ऐसा हुआ नहीं कि खेल के दौरान किसी की मौत हुई हो और अगर हो जाती है तो इसमें 7 मौते माफ की जाती हैं. जो पक्ष गेंद को अपनी सीमा तक ले आता है वो जीत जाता है. जीतने वाली टीम नाचते गाते हुए गेंद को अपने साथ ले जाती है। थलनदी में जहां अजमीर और उदयपुर पट्टियों के बीच गेंद खेली जाती है, तो उत्तराखंड में इस अनोखे खेल से भी संक्रांत मनाया जाता है.

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